नागपुर समाचार : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा का आयोजन 13 से 15 मार्च 2026 के दौरान माधव सृष्टि परिसर में संपन्न हुआ। इस अवसर पर संत शिरोमणि सद्गुरु संत रविदास जी के 650वें प्राकट्य वर्ष के उपलक्ष्य में संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने महत्वपूर्ण वक्तव्य प्रस्तुत किया।
अपने संदेश में उन्होंने संत रविदास जी को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए कहा कि भारत की संत परंपरा ईश्वर की अद्वितीय देन है। इस परंपरा ने न केवल समाज में भक्ति और ईश्वर उपासना का जागरण किया, बल्कि सामाजिक कुरीतियों और भेदभाव को समाप्त करते हुए समरस समाज के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने कहा कि संत परंपरा ने विदेशी शासकों के अत्याचारों के विरुद्ध समाज को जागृत और संगठित करने का कार्य भी किया।
उन्होंने आगे कहा कि संत रविदास जी का जीवन अत्यंत प्रेरणादायी रहा है। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी उन्होंने सांसारिक मोह से स्वयं को अलग रखते हुए साधु-संतों के प्रति श्रद्धा और दीन-हीनों की सेवा को अपने जीवन का आधार बनाया। उनके जीवन से समाज में श्रम की प्रतिष्ठा तथा शुद्ध, सात्विक और पारदर्शी आचरण का महत्व पुनर्स्थापित हुआ।
दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि संत रविदास जी ने भक्ति के माध्यम से समाज में नई चेतना का संचार किया और जन्म आधारित ऊंच-नीच के भेदभाव को नकारते हुए आचरण को ही श्रेष्ठता की कसौटी माना। उन्होंने समाज को रूढ़ियों और कुरीतियों से मुक्त करने तथा समयानुकूल परिवर्तन अपनाने के लिए प्रेरित किया। उनके विचारों के महत्व को स्वीकार करते हुए गुरुग्रंथ साहिब में उनकी 41 वाणियों को ‘शबद’ के रूप में स्थान दिया गया है।
उन्होंने कहा कि साधारण परिवार से आने के बावजूद संत रविदास जी ने अपनी भक्ति, सेवा और निष्कलंक जीवन के बल पर समाज के सभी वर्गों में सम्मान प्राप्त किया। काशी नरेश, झाली रानी तथा मीराबाई जैसे राजपरिवारों के सदस्यों ने भी उन्हें अपना गुरु माना। संत रविदास और मीराबाई का गुरु-शिष्य संबंध निर्गुण और सगुण भक्ति धाराओं के समन्वय का प्रतीक है और समाज के लिए प्रेरणादायी उदाहरण भी है।
अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि कठिन ऐतिहासिक काल में संत रविदास जी ने भक्ति की निर्मल धारा प्रवाहित करते हुए धर्म की श्रेष्ठता का संदेश दिया और लोगों को धर्मपालन के लिए प्रेरित किया। अनेक प्रयासों के बावजूद वे अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे और उनकी आध्यात्मिक शक्ति से प्रभावित होकर विरोधी भी उनके अनुयायी बन गए।
अंत में उन्होंने वर्तमान समय में समाज को जाति और वर्ग के आधार पर विभाजित करने वाली शक्तियों के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि संत रविदास जी के जीवन-संदेश को आत्मसात कर देश और समाज की एकात्मता तथा समरसता के लिए कार्य करने का संकल्प लेना आज की आवश्यकता है।



