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नागपुर : राष्ट्रीय अस्मिता का मानक है लोक : श्रीराम परिहार

नागपुर : लोक के संरक्षण से ही राष्ट्र – समाज का उत्थान संभव है। लोक साहित्य और संस्कृति राष्ट्रीय अस्मिता का मानक है। किसी भी समुन्नत समाज का भविष्य लोक और उसके कल्याण में ही निहित होता है। यह बात लोक साहित्य के विद्वान निराला सृजनपीठ, मध्य प्रदेश शासन के निदेशक डॉ. श्रीराम परिहार ने कही। 

वे हिन्दी विभाग, राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित विशिष्ट व्याख्यान में बोल रहे थे। व्याख्यान का विषय था – ‘लोक साहित्य और संस्कृति।’ उन्होंने कहा कि विकास लोक की बुनियाद पर होना चाहिए, लोक के विनाश पर नहीं। कोई भी संस्कृति, सभ्यता अपने लोक को भुलाकर समृद्ध नहीं हो सकती। 

लोक से जुड़ाव आज के समय की माँग है। बिना लोक से जुड़े और बिना लोक को समझे सामाजिक-सौहार्द कायम नहीं हो सकता । हमारे लोक साहित्य और संस्कृति में वे तत्व रचे – बसे हैं जो हमारी साझी बिरादरी के पुष्ट आधार हैं। डॉ. परिहार ने इस बात पर बल दिया कि लोक रीति और व्यवहार को सामाजिक-पारिवारिक संरक्षण मिलना चाहिए। 

व्याख्यान के द्वितीय सत्र में अपनी बात रखते हुए राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) राज्य विश्वविद्यालय, प्रयागराज के हिन्दी विभाग के पूर्व प्रोफेसर डॉ. क्षमाशंकर पाण्डेय ने कहा कि लोक और शास्त्र के आधार पर हमारी समूची सामाजिक संरचना बुनी गई है। लोक हमारी चेतना में प्रवाहित वह प्राणवायु है जो हमें स्वस्थ और समृद्ध बनाती है। लोक कथाओं, किस्सों में वास्तव में मानवीय जीवन – व्यवहार के सूत्र छिपे हुए हैं। 

लोक साहित्य में केवल मनोविनोद का चित्रण नहीं हुआ है, बल्कि समस्त चराचर जगत के कल्याण की कामना की गई है। आज के मशीनीकरण के दौर में उपभोक्ता संस्कृति के मायाजाल से मुक्ति संभव नहीं है, लेकिन अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाए और बनाए रखने से यह जरूर संभव है कि मनुष्यता को बचाया जा सके। 

लोक साहित्य मानवता का पक्षधर है। अपने प्रास्ताविक उद्बोधन में विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज पाण्डेय ने कहा कि लोक साहित्य और संस्कृति भारतीयता के मापदण्ड हैं । लोक साहित्य में हमारे जीवन-मूल्य रचे-बसे हैं। भारतीय संस्कृति लोक से अपना जीवद्रव्य ग्रहण करती रही है। अतिथि वक्ताओं का परिचय डॉ. सुमित सिंह और अशोक मौर्य ने दिया तथा आभार प्रदर्शन डॉ. संतोष गिरहे ने किया।

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