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नागपूर समाचार : डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति, नागपुर द्वारा आयोजित सम्मान समारोह

नागपूर समाचार : श्री क्षेत्र अवधपुरी में प्रभू श्रीरामचंद्रजी के जन्म स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण, श्री रामलला एवं धर्मध्वजा की प्रतिष्ठापन से सम्पूर्ण हिंदू समाज अत्यंत आनंदविभोर हुआ है। अद्भुत ऐसा यह प्रत्यक्ष निर्माण कार्य जिनके मार्गदर्शन में साकार हुआ है, उन प्रतिभाओं का सम्मान एवं अभिनंदन का कार्यक्रम डॉ. हेडगेवार स्मारक समिती द्वारा संपन्न हुआ।

भारत माता की प्रतिमा को पुष्पार्चन कर मंचपर प पू सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी , प पूज्य गोविंददेव गिरी जी महाराज , सुरेश उपाख्य भैया जी जोशी ( अध्यक्ष ,डॉ हेडगेवार स्मारक समिति ) श्रीधर जी गाडगे ( उपाध्यक्ष,डॉ हेडगेवार स्मारक समिति) के उपस्थिति में यह कार्यक्रम संपन्न हुआ. श्रीराम जन्मभूमी मुक्ती का 500 वर्षों का प्रदीर्घ संघर्ष ‘रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे, मंदिर भव्य बनाएंगे’ के नारों से जब 40 साल पहले भारत की गलि-गलियां गुंज रही थी तब समूचे हिंदू समाज के आंखो में एक दिव्य स्वप्न था, मन में दृढ़ विश्वास था कि एक दिन वह स्वर्णिम दृश्य हम अवश्य देखेंगे। हम भाग्यशाली है कि हमने 22 जनवरी 2024 को वह अद्भूत स्वर्णिम दृश्य देखा। ‘सब में राम, सब के राम की अनुभूती देनेवाला भारत भी उस दिन सारी दुनिया ने देखा। ऐसी सुखद अवस्था के कारण ही विश्वामित्र के समान हमें भी यह आयोजन करने में विलंब हुवा है। परंतु अंततः आज वह अवसर आया है।

उद्बोधन प. पू. सरसंघचालक जी

मंदिर श्री राम जी की इच्छा से बना , जब तक सबकी लकड़ी नहीं लगती गोवर्धन नहीं उठता। उठता तो भगवान की करांगुली पर ही है। परंतु उनकी करांगुली तब तक काम नहीं करती जब तक बाकी लोग लकड़ी नहीं लगाते। मंदिर भी ऐसे ही बना। सनातन धर्म का उत्थान होने के लिए भारतवर्ष का उत्थान अवश्यमभावी है। 150 साल पहले योगी अरविंद जी ने घोषित कर दिया है। जैसे-जैसे एक-एक लकड़ी लगेगी वैसे-वैसे भगवान की करांगुली का बल इस संकल्प के पूर्ति के लिए प्रवाहित होता रहेगा।

आप ऐसा विचार कीजिए कि उत्थान की प्रक्रिया शुरू हो गई 1857 से 2014 में जब यहां लोकसभा के चुनाव परिणाम आए ,शपथ विधि हुआ नए सरकार का मोदी जी के नेतृत्व में तो लंदन के गार्डियन ने लेख लिखा ऑन दिस डे द इंडियंस हैव फाइनली सेड गुड बाय टू द ब्रिटिश टेक्निकली हमने गुड बाय तो 15 अगस्त 1947 को ही कर दिया परंतु अभी भी हम निश्चित नहीं थे। भारत का उत्थान होना है। लेकिन भारत क्या है? कौन सा उत्थान होना है? भारत इंडिया है क्या? इस पशोपेश में सारा समय जा रहा था। एक रास्ता पकड़ा अपने देश ने। इतना बड़ा आंदोलन नहीं होता तो मंदिर बनता क्या? इतना बड़ा आंदोलन हो गया। लेकिन सत्ता में लोग राम मंदिर बनाने वाले नहीं बैठते तो राम मंदिर बनता क्या? राम मंदिर बनने का निर्णय हो गया लेकिन नीव बनाने वाले नहीं मिलते तो आगे कैसे खड़ा होता? भारतवर्ष के एक-एक व्यक्ति की लकड़ी लगी है। तब श्री राम की करांगुली ने अपना चमत्कार दिखाया है। और यह प्रक्रिया है। ये आगे चलेगी। विश्व को धर्म देने वाला भारत खड़ा होना है। संघ की 100 साल की यात्रा कैसे चली? संघ के पास था तो कुछ नहीं। ना प्रसिद्धि थी ना सत्ता थी ना प्रचार था ना साधन थे धन था डॉक्टर हडगेवार को अनुयाई मिले उनकी आयु क्या थी उनका अनुभव क्या था परंतु एक श्रद्धा और विश्वास ले चले- हिंदुस्तान हिंदू राष्ट्र है , लोग हंसते थे वो प्रारंभ के दिन की बात नहीं. राम मंदिर बनने तक हिंदुस्तान हिंदू राष्ट्र है कहने पर हंसने वाले लोग थे।

आज हंसने वाले लोग ही कह रहे हैं कि हिंदुस्तान हिंदुओं का देश है। हमको कहते कि आप घोषित करो आप। हम कहते घोषित करवाने की जरूरत नहीं जो है वो सो है। सूरज पूरब से उगता है। ये घोषित करना चाहिए क्या? वह पूरब से ही उगता है। वह जहां से उगता है उसको हम पूरब कहते हैं। तो भारत हिंदू राष्ट्र है। आज सबको मान्य है। लेकिन उस समय क्या था? उस समय सब लोग खिल्ली उड़ाते थे। यह जो नए अननुभवी कार्यकर्ता थे उनके मन में जो श्रद्धा थी डॉक्टर हेडगवार के वचनों पर जो विश्वास था उसके कारण इन सब बातों के बावजूद वो काम करते रहे पतवार चलाते जाएंगे मंजिल आएगी।

आएगी मन में आता भी था और मजाक में कहते थे भी कि हम यही करने वाले हैं पतवार चलाते जाएंगे वही करने वाले मंजिल आएगी आएगी ऐसा कहने वाले हैं। मंजिल कब आएगी किसको पता लेकिन ऐसा मजाक करते समय भी पतवार चलाना छूटा नहीं किसी का। श्रद्धा विश्वास के साथ शुरू किया और करते रहे। तो विरोध और उपेक्षा में तो थोड़ा सा सरल हो जाता है ऐसा करना क्योंकि विरोध मन में एक जोश पैदा करता है। उपेक्षा एक जिद पैदा करती है कि हम जो कह रहे हैं वो करके दिखाएंगे। लेकिन अनुकूलता में सुखासीनता आती है। समाधान भी आता है। सबसे खतरे वाली बात यह है।

अनुकूलता को नकार तो नहीं सकते। देश के लिए लाभ है। समाज के लिए लाभ है। परंतु उसमें अपने मन में समाधान नहीं आना चाहिए। राम राज्य केवल राजा के कारण नहीं होता। प्रजा के कारण भी होता है। श्री राम के गुणों का वर्णन जैसे रामायण में है राम राज्य के अधर के नाते वैसे राम राज्य की प्रजा कैसी थी इसका भी वर्णन है। तो मंदिर निर्माण अयोध्या में जो होना था हो गया। उसकी व्यवस्था के लिए एक विश्वस्त मंडल बना है। समय-समय पर वो करते रहेंगे। आवश्यक मदद जुट जाएगी। सब जगह से यह होगा। परंतु जो प्रत्येक मन की अयोध्या बनाकर राष्ट्र का मंदिर खड़ा करना है वह काम तो हम सबको अपनेपने जगह पर करना पड़ेगा और किसी भी परिस्थिति में श्रद्धा विश्वास पूर्वक होगा यह मानकर सतत प्रयास करने पड़ेंगे। राम राज्य में ही राम राज्य के प्रजा के आचरण का जो वर्णन है ऐसा आचरण मेरा बने। मेरे परिवार का बने और हमारे कारण अपने समाज में उस आचरण का प्रचार प्रसार हो। प्रत्यक्ष आचरण शुरू हो। हम जहां हैं जिस संस्था में है, संगठन में है, , व्यक्तिगत कुछ अपना प्रभाव है, जितना प्रभाव है, अपनी जो कुछ शक्ति है, वह लगाकर इसको करते रहना छोटे बड़े दायरे में। यह हम करेंगे तो भगवान की इच्छा तो है ही कि दुनिया को धर्म देने वाला भारत खड़ा होना चाहिए। कितने जल्दी होगा यह हमको तय करना है। हम सब लोग लगेंगे तो विश्व में फैले प्रचंड हिंदू समाज की इतनी शक्ति है कि अगर सोच कर शुरू करेगा तो एक दिन में कर देगा।

हम कृतज्ञ हैं। मंदिर बनाने में जिन सब लोगों का योगदान हुआ उस कृतज्ञता का ज्ञापन ही इस सत्कार समारंभ के द्वारा हमने किया है। उन्होंने अपना काम किया। हमको अपना काम करना है। उस हम में वे भी सम्मिलित है। उनको एक विशिष्ट कार्य दिया था कि यहां मंदिर बनाना है। वह बन गया। उत्कृष्ट किया। कल्पना से अति भव्य किया। कल्पना से भी सुंदर किया और सुंदर होगा। योजनाएं चल रही है। हमको भी अपना काम ऐसा ही करना है। कल्पना से अधिक उत्तम अधिक भव्य अधिक सुंदर करना है। ताकि विश्व में धर्म की स्थापना हो। विश्व की आज जो आवश्यकता है वह होना है वो भारत के द्वारा ही होगा और भारत का उत्थान भारत की संतान ही करेगी और कोई देश भारत का उद्धार नहीं करेगा। भारत बड़ा होकर सारी दुनिया का उद्धार करेगा। ये विधि लिखित है। उसको पूर्ण करने में हमारा हाथ लगे तो जल्दी से जल्दी कम से कम नुकसान में हो जाएगा। इतना विचार हम सब लोग आज के निमित्त करें।

कार्यक्रम के प्रस्ताविक में भैय्या जी जोशी बोले

छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्यारोहण अवसर के बाद देश में एक परिवर्तन की प्रक्रिया गतिमान हुई थी। मुगलों का साम्राज्य समाप्त हुआ। अंग्रेजों का आगमन होना शुरू हुआ था। लेकिन एक संघर्ष का कालखंड लगभग समाप्त हुआ। उसके बाद भी स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए एक लंबा अवसर गया। राह देखनी पड़ी। यह परिवर्तन की प्रक्रिया छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्यारोहण से जो शुरू हुई वो नित्य गतिमान होती रही और एक एक कदम भारत आगे बढ़ता गया। सब प्रकार के आक्रांताओं की निशानियां वेदना दायक रहती है। ऐसे सारे चिन्हों को दूर करने का प्रयास भी एक कालखंड में प्रारंभ हुआ। उसी प्रक्रिया में भारत का सारा हिंदू समाज जिससे अपने आप को अपमानित अनुभव कर रहा था। वो अयोध्या के राम जन्मभूमि के स्थान पर निर्माण किया गया।

आक्रांताओं का एक चिन्ह उसको मिटाने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। एक संघर्ष लंबा चला है और यह छोटा संघर्ष नहीं है। 400 वर्षों के निरंतर संघर्ष, 1 लाख से अधिक लोगों का बलिदान और उसके बाद शुरू हुई कानूनी प्रक्रिया। उसके बाद उस कानूनी प्रक्रिया के बाद उस स्थान पर निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। मंदिर की कमी नहीं है भारत में। राम मंदिर तो स्थान स्थान पर है। तो लोग प्रश्न पूछते थे कि राम मंदिर तो इतने स्थानों पर है तो अयोध्या की क्या विशेष बात क्या है? तो वो जो एक अपमान का कलंक था उसको मिटाए बिना राष्ट्र भाव प्रबल कैसे हो सकता है? और इसलिए राष्ट्रभक्त लोग राष्ट्र का प्रबल भाव अंतकरण में रखने वाले समाज के लोग खड़े हुए। यह मंदिर केवल एक मंदिर तो नहीं है। हमको तो आंखों से देखने वाला दिखाई देने वाला तो मंदिर ही है। पर यह मंदिर हिंदू समाज के एक पुन प्रतिष्ठा का प्रतीक है।

हिंदू समाज के सम्मान की प्रतिष्ठा का प्रतीक है। इसलिए इस मंदिर का संदर्भ उत्तर प्रदेश अयोध्या वासी यहां तक सीमित नहीं है। जो जो भी एक लंबे संघर्ष आंदोलन हुए वह कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक राजस्थान की सीमाओं से लेकर मणिपुर तक फैले हुए पूरे भारतवर्ष में इसके प्रति एक जन जागरण . श्रंखला में जो एक कार्यक्रम दिया गया वो इस मंदिर के लिए रामशिला पूजन होकर अयोध्या जाएंगे। लगभग ढाई लाख से अधिक गांवों से उस गांव की मिट्टी उस गांव का पानी उस गांव के लोगों ने बनाई हुई रामशिला करोड़ों लोगों ने उसका पूजन करके इस अयोध्या की ओर भेजा तो यह मंदिर केवल उत्तर भारत केवल अयोध्या का कैसे हो सकता है ,ये तो करोड़ों लोगों की भावनाओं का एक प्रतीक है।

भगवान राम के जीवन के संदर्भ में तो हम बहुत कुछ बातें जानते ही हैं। आज भी आदर्श व्यवस्थाएं बताते समय राम राज्य की ही कल्पना को रखा जाता है। इसलिए जब कहा गया कि इस मंदिर से राष्ट्र निर्माण का कार्य तो राष्ट्र निर्माण में राज्य की भी एक भूमिका होती है। उस प्रकार का आदर्श हम सबके सामने रहे। यह इस अयोध्या के मंदिर का संदेश। इसलिए केवल पत्थरों का और मजदूरों ने बनाया हुआ एक शिल्प इस नाते नहीं है। शायद शिल्प और इसके नाते इससे भी अच्छे मंदिर भारत के अंदर होंगे। नहीं है उसमें कमी नहीं है कुछ भी। तो ये राष्ट्र भाव के प्रगटीकरण का एक प्रतीकात्मक शिल्प हम सबके सामने है और इसलिए स्वाभाविक रूप से एक इसके निर्माण की प्रक्रिया लंबी चली। जिम्मेदारी लेने वाले लोग खड़े हुए और फिर इसकी प्रक्रिया जब प्रारंभ हुई तो कई गत पांच वर्षों से लगातार परिश्रम करते हुए इस भव्य का भव्य मंदिर का निर्माण हुआ है। स्वाभाविक रूप से जिन्होंने बहुत बड़ी ऊर्जा शक्ति लगाई ऐसे बंधुओं को हम सबके मन में विचार था कि उनको एक बार नागपुर बुलाकर उनके योगदान का एक सम्मान किया जाए। अब यह सम्मान तो प्रतीकात्मक होता है। काम करने वाले आज यहां पर जितने हैं उससे 100 गुना वहां पर थे। लेकिन उनके एक प्रतीकात्मक रूप में कुछ लोगों को यहां पर बंधुओं को यहां पर निमंत्रित किया गया।

श्री चम्पत राय जी , मंदिर निर्माण सम्बंधित अविस्मरणीय प्रसंग साझा किये

विचार तो बहुत दिनों से था विश्वास भी था। लेकिन यह कल्पना नहीं थी कि ऐसा बनेगा, ऐसा बन जाएगा। शुरू शुरू से ही यह विचार था कि 1000 साल आयु के लिए मंदिर बनना चाहिए। अब 1000 साल की बिल्डिंग कौन सी होती है? यह तो बात जानकारी में नहीं थी। इतना ही जानते थे कि रामेश्वरम, मदुरई, तजापुर, कोणार्क 1000 साल से खड़े हैं। उससे भी अधिक आयु से खड़े हैं। 500 साल हो गया लाल किला ताजमहल खड़े हैं। यह बनना चाहिए। तो धीरे-धीरे विचार आया कि 1000 साल अगर बनाना है तो फिर उसमें लोहा नहीं हो सकता। तो इस मंदिर में एक ग्राम लोहे का भी उपयोग नहीं है। जमीन के नीचे भी नहीं है, जमीन के ऊपर भी नहीं है। एक प्लेन कंक्रीटिंग होती है। तो विद्वानों ने कहा कि सीमेंट की आयु 150 साल से ज्यादा नहीं है। उसके बाद वह शक्तिहीन हो जाता है। बाइंडिंग फोर्स खत्म हो जाती है। तो धरती के ऊपर कंक्रीट नहीं है और धरती के नीचे कंक्रीट है तो उसमें सीमेंट न्यूनतम न्यूनतम न्यूनतम पत्थरों को पत्थरों से कैसे जोड़ेंगे? तो जितनी पत्थर की आयु उतनी आयु तांबा तो तांबे से जोड़ेंगे। अब यह टेक्निक कौन जानता है? तो शायद कुछ दिनों बाद स्वीकार करेंगे लोग कि स्वतंत्र भारत में जितने आईआईटी सिविल इंजीनियरिंग कॉलेज हैं वहां कहीं इस प्रकार की तकनीक का अध्ययन नहीं है। कोई जानता ही नहीं कि लाल किला की नीव कैसे बनी। कोई किताब नहीं। कहीं पढ़ाया नहीं जाता। तो यहां जो कुछ हुआ सब एक प्रकार का रिसर्च भी हुआ और कार्य भी हुआ। यह काम किसके माध्यम से हुआ? तो मैं समझता हूं अगर केवल हम कहेंगे ट्रस्ट के माध्यम से हुआ तो शायद हम सच्चाई से बहुत दूर जाएंगे।

ट्रस्ट में एक दायित्व है अध्यक्ष मंदिर निर्माण समिति। ट्रस्ट बनते समय माननीय प्रधानमंत्री जी ने इच्छा व्यक्त की कि इस स्थान पर मैं एक नाम बताता हूं उनको रखो। श्री निरपेंद्र मिश्रा हमारे बीच में हैं। माननीय प्रधानमंत्री जी के छ साल तक विशेष सचिव रहे। उत्तर प्रदेश 1967 बैच के भारतीय प्रशासन सेवा के अधिकारी हैं। और उत्तर प्रदेश में आपातकाल भी देखा है और मंदिर निर्माण के आंदोलन का काल भी उन्होंने देखा है। कुल कितने व्यक्तियों ने काम किया। यद्यपि लारसन टबरों ने इस सबको अपने ऊपर लिया तो लार्सन टबरों ने भी मैं कह सकता हूं कि कम से कम 250 वेंडर्स का सहयोग लिया और इन सब वेंडर्स के साथ कम से कम 6000 कारीगर अपनेपने स्थानों पर अयोध्या में काम करते रहे। 22 जनवरी 2024 को तो 4000 व्यक्ति अयोध्या में मंदिर निर्माण में काम करते थे। 4000 लोग साल में मंदिर बन गया। यह भी एक सौभाग्य का विषय है। ईश्वरी कृपा है। यह समाज के स्वैच्छिक समर्पण से बना हुआ स्थान है। आप सबका योगदान उसमें है। 42 दिन में कम से कम 10 करोड़ लोगों ने इसमें योगदान दिया है। मैं समझता हूं 1 लाख कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर हाथ फैलाया है और यह पहला शायद हिंदुस्तान का प्रयोग माना जाएगा कि 42 दिन में 3000 करोड़ बैंक में आ गया। किसी के हाथ में कुछ भी नहीं धन नहीं आया। सब कुछ ऑनलाइन था। डिजिटलाइज था। देश की स्टेट बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, पंजाब नेशनल बैंक की कम से कम 25,000 ब्रांच बैंक ब्रांचेस के माध्यम से धन ट्रांसफर होकर अयोध्या पहुंचा। सरकार के रेवेन्यू को तनिक भी हानि नहीं होनी चाहिए। और सरकार का बजट मंदिर कार्य में नहीं लगना चाहिए। सरकार के बजट का उपयोग समाज के लिए है। मंदिर निर्माण के लिए समाज ने धन दिया है। नदी के किनारे है सरयू के तट पर है। इसरो ने सब सूचनाएं दी। कभी यहीं पर नदी बहती थी। भविष्य में कभी हो सकता है नदी दिशा पलट जाए। तो जमीन के नीचे उस जल प्रलय को रोकने के लिए रिटेनिंग वाल डाली गई। धरती की नमी पत्थर को खराब करेगी। तो धरती की नमी वर्षा काल के पानी का डैंपनेस सैंड स्टोन को टच नहीं करना चाहिए। इसलिए प्लिंथ उठाने के लिए ग्रेनाइट का इस्तेमाल किया गया।

लकड़ी को दीमक ना लग जाए। तो फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टट्यूट ने कहा कि महाराष्ट्र के बल्लारशाह की लकड़ी का उपयोग करो। लकड़ी का नागपुर में ट्रीटमेंट हुआ। सारे देश की विशेषज्ञता यहां आई है। अब लकड़ी की नक्काशी यहां बैठे हैं। हैदराबाद के एक संस्था को दी गई। उनके कारीगर सब कन्याकुमारी के। तो कन्याकुमारी के कारीगर लकड़ी की नक्काशी हाथ से करते हैं। तो तमिलनाडु का कन्याकुमारी का योगदान है। तेलंगाना से ग्रेनाइट आया है। कर्नाटक से ग्रेनाइट आया है। हैदराबाद के व्यक्ति ने नक्काशी कराई है लकड़ियों की। मकराना का वाइट मार्बल आया है। सैंड स्टोन राजस्थान के भरतपुर जिले का है। छतरपुर से स्टोन ब्लास्ट आया है। खंभों के ऊपर मूर्तियां गणेश जी बनाने हैं। यह काम उड़ीसा के कारीगरों ने किया है। केवल चित्र देखते हैं और बना देते हैं। मुंबई के वासुदेव कामत हर प्रसंग को इस पेंसिल स्केच से बनाते हैं। उसके बाद मूर्ति बनती है। सारे भारत का राष्ट्रीय एकीकरण वननेस इंटीग्रेशन दक्षिण भारत में एक कल्पना है परकोटा। उत्तर भारत में कहीं नहीं है। यहां परकोटा बना है। एक प्रकार की चारों दिशाओं में एक रेक्टेंगुलर वाल है। आयताकार है। 14 फीट चौड़ी है। क्राउड कंट्रोल के लिए आद्य जगतगुरु शंकराचार्य जी महाराज ने पंचायतन का विचार दिया तो इस परकोटे के चार कोनों पर पंचायतन है सूर्य, भगवती, शंकर ,गणपति बीच में राम, विष्णु के अवतार हैं. भगवान की जहां रसोई बनेगी वहां भी एक मंदिर बनाया माता अन्नपूर्णा ,हनुमान जी बनाए। एक विचार आया कि लक्ष्मण जी ने 14 साल तक जागकर कभी सोए नहीं। राम की रक्षा की। शेषनाग के अवतार के रूप में शेषवतार मंदिर बनाया। राम को राम किसने बनाया? तो विश्वामित्र ने वशिष्ठ ने। राम को शस्त्र दिए अगस्त ने राम का जीवन समाज के सामने सबसे पहले लाए वाल्मीकि सबके मंदिर बने निषाद शबरी इनके मंदिर बनाए गए माता अहिल्या. जटायु पहला बलिदानी है जो बिना किसी की प्रेरणा के स्वेच्छा से अन्याय के विरुद्ध आकाश में लड़ गया .जटायु को स्थापित किया गया है दीनहीन छोटी सी गिलहरी वह भी अपना योगदान कर रही है। इस पुल के निर्माण में एक गिलहरी बैठाई गई है। भगवान राम का जीवन जन्म से लेकर राज्या अभिषेक तक पत्थरों के पैनल बनाए गए हैं। 3D मंदिर के चारों ओर वर्टिकल वाल पर लगाए गए हैं।

यह हिंदुस्तान के गौरव का मंदिर है या आप सब का स्थान है। आपके सम्मान का मंदिर है और हम सब अपने को भाग्यशाली ही मानना चाहिए कि हमारे रहते हुए यह काम पूरा हुआ।

इन विभूतियों का हुआ सम्मान (शाल, श्रीफल, सम्मान चिन्ह)

1) श्री नृपेन्द्र जी मिश्र 

2) श्री जगदीश जी आफळे

3) श्री गिरीश जी सहस्त्रभोजनी

4) श्री जगन्नाथ जी गुळवे

5) श्री आशिष जी सोमपुरा

6) श्री निखिल जी सोमपुरा

7) श्री अरुण जी योगिराज

8) श्री जय काकतीकर जी

9) श्री मनिष जी त्रिपाठी

10) श्री सत्यनारायण जी पाण्डे

11) श्री अनिल जी सुतार

12) श्री केशव जी शर्मा

13) श्री विनोद जी शुक्ला

14) श्री राजीव जी दुबे

15) श्री मनिष जी दाधीच

16) श्री विनोद जी मेहता

17) श्री अंकुर जी जैन

18) श्री राजूकुमार सिंह जी

19) श्री ए. व्ही. एस्. सूर्या श्रीनिवास जी

20) श्री नरेश जी मालवीय

21) श्री परेश जी सोमपुरा

22) श्री नाथ अय्यर जी

23) श्री संजय जी तिवारी

24) श्री शरद बाबू जी

25) श्री अनिल जी मिश्र

26) श्री गोपाल जी

27) श्री चम्पतराय जी

28) पू. गोविंददेवगिरी महाराज जी

29) श्री वासुदेव जी कामत

30) श्री रमजानभाई जी

आशीर्वचन प. पू. स्वामी गोविंददेवगिरी

डॉक्टर हेडगेवार स्मारक समिति ने यद्यपि इसे सम्मान कहा होगा। हम पूज्य डॉक्टर जी के प्रसाद के रूप में उसका स्वीकार करते हैं। पूज्य डॉक्टर जी की प्रेरणा इस देश में 100 वर्षों तक कार्य कर रही है और उसी के फलीभूत हम आज उस ऊंचाई तक पहुंच गए हैं जहां पहुंचना बहुत कठिन लगता था। बहुत कठिन लगता था क्योंकि वातावरण इस प्रकार का था। अरे भगवान श्री राम का मंदिर तो बनाने का प्रयास हम लोग कर रहे थे। लेकिन ऐसे ऐसे लोग सत्ता में बैठे थे जो सर्वोच्च न्यायालय में जाकर के एफिडेविट दे रहे थे कि भगवान श्री राम काल्पनिक है। भगवान श्री राम हुए ही नहीं और रामसेतु भी मैनमेड नहीं है। भगवान श्री राम के अस्तित्व को नकारने जैसे उनको काल्पनिक बताने जैसे वातावरण से यहां तक कि जो अत्यंत बड़ी कठिन यात्रा हो सकी है। इसका कारण केवल केवल और केवल संघ की शिक्षा और संघ की दीक्षा है। संघ ने हम लोगों को सहना सिखाया। सह करके भी प्रलोभनों से दूर रहना सिखाया। यह सिखाया कि जो कुछ करना है वह अपने लिए नहीं करना है। तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहे न रहे तेरा वैभव अमर रहे। इस प्रकार के मंत्र को लेकर के प्रयास करने वाले अगणित लोग एक शताब्दी तक काम करते रहे हैं। मंदिर का निर्माण केवल मंदिर की प्रक्रिया का जब आरंभ हुआ उससे नहीं हुआ है। एक शताब्दी तक जो यज्ञ चला है उस यज्ञ की पूर्णाहुति के रूप में यह मंदिर खड़ा हुआ है। मैं दो लोगों को और याद करना चाहता हूं। प्रतिनिधि के रूप में याद करना चाहता हूं। हमारे परम पूज्य अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास जी ,हमारे सभी संतों के प्रतिनिधि है, प्रतीक है। इसलिए हम अपनी वाणी से उनका पूजन करते हैं। हम अपनी वाणी से उनका अभिनंदन करते हैं। और एक नाम जिसका उल्लेख किए बिना यह काम अधूरा रह जाएगा। अभी माननीय उपेंद्र जी ने बताया, माननीय चंपत राय जी ने बताया किस प्रकार का वहां पर एक समस्याओं का जमावड़ा हो गया था। हमें नींव नहीं मिल रही थी। हम लोगों ने आर्टिफिशियल चट्टान को निर्माण किया और चट्टान के ऊपर मंदिर खड़ा हो गया। एक इसी प्रकार की चट्टान इस पूरे कार्य के पीछे खड़ी रही और वे है हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी। एक चट्टान के रूप में वे खड़े थे। उनकी इच्छाशक्ति और उनका माइक्रो मैनेजमेंट का सेंस ये इतना विलक्षण था। उसके बिना पता नहीं हम इस पड़ाव तक पहुंचते कि नहीं पहुंचते। यह जो मैं बोल रहा हूं यह सबके मन में भी है। और मैं अपनी वाणी से यह सम्मान उन्हें अर्पण कर रहा हूं।

आजकल मैं अपनी कथा में कहते रहता हूं मंदिर भव्य बनाएंगे। मंदिर वही बनाएंगे। यह तो हो गया। राम राज्य भी लाएंगे। यह अभी तक हम लोगों का कार्य बाकी है। राम जी का मंदिर यह पूर्णाहुति नहीं है। यह वाक्य का पूर्ण विराम नहीं है। यह सल्प विराम है। अत्यंत बुद्धिमत्ता के साथ राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र का जो न्यास बनाया गया उसमें भी यह बात उल्लेखित है कि हम लोगों को आगे जो प्रयास करना है वह राम राज्य के लिए करना है और इसलिए जिनका सम्मान किया गया जिनका जिनको प्रसाद मिला है उन लोगों को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि यह अंतरिम है यह तो इंटरवल का प्रसाद है।

आगे हम लोगों को अभी तक बहुत काम करना है। यह अब तक का प्रसाद है और आगे के लिए पाथेय है। यह मार्गक्रमण हम लोगों को करना ही होगा। भगवान श्री राम हमारे राष्ट्र जीवन के सर्वोच्च आदर्श है। आ सेतु हिमाचल संपूर्ण भारत को बांधने वाला यदि कोई एक शब्द है तो वह शब्द राम यही हो सकता है। ध्यान रखना और इसलिए भगवान श्री राम सबके हैं। प्रभु ने सबको जोड़ के अपना कार्य किया। लेकिन यह कार्य करते समय भगवान को भी तपना पड़ा।

भगवान को भी बहुत बहुत कष्ट झेलने पड़े। उनको भी वनवास सहना पड़ा। बन गए। इसीलिए राम बन गए। भगवान श्री राम के सारे गुणों की परीक्षा उनके वनवास काल में होती है। इस प्रकार का स्वेच्छ वनवास हमारे प्रचारकों ने स्वीकार करके अपने अपने जीवनों को बिताया। वह स्वयं स्वीकृत वनवास था। और इसी प्रकार के वनवास के स्वयं स्वीकृत सेवा कार्य के कारण इस प्रकार के महान कार्य होते हैं।

संघ देशभक्ति पढ़ाने वाला एक खुला विश्वविद्यालय है और इसलिए इस देश की सेवा करना इस देश की भक्ति करना या एकमात्र मंत्र देकर के और सारे स्वयंसेवक अपने अपने क्षेत्रों में जो जो काम करते रहे हैं उन कामों ने अब रंग लाया है। लेकिन अभी बहुत कुछ बाकी है। जो पाया वो अच्छा है। लेकिन जो खोया उसको भी भूल नहीं जाए। ऐसा विचार करके सतत अभी भी कार्य करते रहना पड़ेगा। एकात्मता मंत्र से इस सम्मान समारोह का समापन हुआ। 

॥सम्मानपत्र॥

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा।

हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥

दीनदयाल विरद संभारी।

हरहु नाथ मम संकट भारी॥

आत्मीय स्वजन, सप्रेम जय श्रीराम

यह सन्मान पत्र उन समर्पित, कुशल एवं श्रद्धासंपन्न विभूतियों को विनम्रतापूर्वक समर्पित है, जिन्होंने माॅ भारती की सेवा के पावन संकल्प से प्रेरित होकर अपने अथक परिश्रम, अनुपम शिल्पकला, अद्वितीय निष्ठा एवं अखंड साधना द्वारा श्री अवधपुरी में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र पर श्रीरामलला के भव्य, दिव्य एवं राष्ट्रमंदिर स्वरूप निर्माण में अमूल्य योगदान प्रदान किया है।