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बसंत पंचमी विशेषांक : क्यों की जाती है वसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा

बसंत पंचमी विशेषांक : हर साल माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को बसंत पंचमी का त्योहार मनाया जाता है। यह पर्व देवी सरस्वती को समर्पित है। माना जाता है कि इस दिन माता सरस्वती का जन्म हुआ था। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस दिन मां सरस्वती की आराधना करने से देवी लक्ष्मी और मां काली भी प्रसन्न होती हैं।

बसंत पंचमी पूजा विधि

बसत पंचमी के दिन सुबह खान करने के बाद पीले या सफेद रंग के कपड़े रहनें। फिर सरस्वती पूजा का संकल्प लें। पूजा घर पर देवी सरस्वती की मूर्ति या फोटो स्थापित करें। माता को गगा जल से स्नान कराएं। इसके बाद पीले पुष्प, अक्षत, सफेद चंदन, धूप, दीप आदि अर्पित करें। इस दिन पीली मिठाई का भोग लगाना चाहिए। सरस्वती वंदना और मंत्र के साथ पूजा करनी चाहिए। आप चाहें तो सरस्वती कवच का पाठ कर सकते हैं। ओम श्री सरस्वत्यै नमः मंत्र का जाप करते हुए हवन करें। फिर अंत में माता सरस्वती की आरती करनी चाहिए। बसंत ऋतु के आगमन का सबसे पवित्र त्योहार बसन्त पंचमी माना जाता है। इस दिन ज्ञान की देवी माता सरस्वती की पूजा की जाती है। इसे हर साल माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इसी दिन से ही बसत ऋतु की शुरुआत भी होती है। बसंत पंचमी के इस शुभअवसर पर पीले वस्त्र धारण कर विद्या की देवी सरस्वती की आराधना का विधान है।

बसंत पंचमी के लिए सरस्वती वंदना बसंत पंचमी के दिन मा सरस्वती की वदना के बगैर पूजा अधूरी रह जाती है। विद्या और ज्ञान की देवी सरस्वती की आराधना के लिए सरस्वती स्त्रोतम का एक अंश बहुत महत्वपूर्ण है। बसत पचमी के दिन सरस्वती वदना के दौरान इसका पाठ करना अत्यंत लाभकारी होता है या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता। या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ॥ या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता । सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥1॥

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं। वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम ॥ हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम। वन्दे तां परमेश्वरी भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम ॥2॥

अर्थ-

जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चन्द्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की हैं और जो श्वेत वस्त्र धारण करती है, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित है, वही सम्पूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली माँ सरस्वती हमारी रक्षा करें।

बसंत पंचमी का महत्व

बसंत पंचमी के इस त्योहार को किसी भी कार्य के लिए शुभ माना जाता है, लेकिन विवाह के लिए इसे सबसे शुभ मुहूर्त माना गया है। इसके अलावा विद्यारंभ, नवीन विद्या प्राप्ति और ग्रह-प्रवेश के लिए भी यह दिन बहुत ही शुभ माना गया है। इसे प्रकृति का उत्सव भी माना गया है। महाकवि कालिदास ने बसंत को ऋतुसंहार नामक काव्य में सर्वप्रिये चारुतर बसते से अलकृत किया है। इसके अलावा श्रीहरि विष्णु के अवतार भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता में ऋतूनां कुसुमाकराः अर्थात ‘मैं ऋतुओं में बसंत हूँ’ कहकर बसंत को अपना स्वरूप बताया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार माना जाता है कि इसी दिन कामदेव और रति ने मानव हृदय में पहली बार प्रेम और आकर्षण का संचार किया था। माता सरस्वती के अलावा इस दिन कामदेव और रति की पूजा भी करना चाहिए। इससे आपका दांपत्य जीवन खुशहाल गुजरता है। वहीं सरस्वती माता की पूजा करने से जीवन अंधकार से ज्ञानरूपी प्रकार की ओर गतिमान होता है।

बसंत पंचमी की कथा

पौराणिक ग्रंथों में वर्णित कथाओं के अनुसार श्रीहरि विष्णु के आदेश पर ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की। सृष्टि की रचना के दौरान धरती पर हरेक चीज मौजूद थी। लेकिन ब्रह्मा जी को कुछ कमी खल रही थी। इस कमी को दूर करने के लिए ब्रह्मा जी ने अपने कमल से जल निकालकर जमीन पर छिडक दिया। इस जल के धरती पर छिडकते ही एक तेज प्रकाश निकला और धरती कंपन करने लगी। इसी तेज प्रकाश से एक कन्या उत्पन्न हुई। जिसके एक हाथ में वीणा, एक में पुस्तक और एक हाथ में माला मौजूद थी। इसके अलावा चौथा हाथ वरदान देने की मुद्रा में था। इसके बाद जैसे ही उस कन्या ने वीणा के तार छेड़े, इस धरती की हर चीज में स्वर आ गया। इसी वजह से उस कन्या का नाम सरस्वती रखा गया। तब से लेकर आजतक तीनों लोकों में मां सरस्वती की विधिवत रूप से पूजा की जाती है।