महाराष्ट्र समाचार : बुधवार सुबह बारामती के पास विमान दुर्घटना की खबर सुनी तो मन यह मानने को तैयार नहीं था कि इतना बड़ा अनर्थ हो गया होगा. जब तक डॉक्टरों की ओर से कोई आधिकारिक जानकारी नहीं मिली, तब तक किसी भी खबर पर विश्वास करने की हिम्मत नहीं हो रही थी. सुप्रिया ताई से लगातार बात हो रही थी. लेकिन आखिरकार वह दुःखद समाचार सामने आ ही गया- हमारे प्रिय अजित दादा अब हमारे बीच नहीं रहे. मैंने अपना बेहद करीबी, दमदार और दिलदार दोस्त खो दिया.
दादा हमेशा मेरे सच्चे मित्र रहे. हालांकि, 2019 के बाद हमने बहुत ही करीबी तालमेल के साथ काम किया, लेकिन उससे पहले भी विकास और राज्य के कल्याणकारी मुद्दों पर हम एक साथ खड़े रहते थे. दूरदृष्टि रखने वाले नेता बहुत कम होते हैं और दादा उनमें से एक थे. अपनी जुबान का पक्का नेता और सच्चा दोस्त कैसा होता है, यह मैंने दादा के साथ रहकर करीब से महसूस किया.
हमने साथ मिलकर कुछ नई राजनीतिक पारियां शुरु की थीं. लग रहा था कि यह इनिंग लंबी चलेगी, लेकिन दादा ने बहुत जल्दी एक्जिट ले लिया. बाद के दिनों में वे मुझे हमेशा ‘सीएम साहेब’ कहकर पुकारते थे. 2019 में वे उपमुख्यमंत्री बने और मैं विपक्ष का नेता था. फिर भी, सदन में बोलते समय वे अक्सर मुझे ‘सीएम साहेब’ कह देते थे. उसके बाद हल्के से जीभ काटकर मुस्कुराते हुए ‘देवेंद्रजी’ कहते थे.
विचारों के स्तर पर मैं उनका उल्लेख अक्सर राजनीतिक मित्र के रूप में करता था, लेकिन सच यह है कि हमारी दोस्ती राजनीति से कहीं बढ़कर थी. काम के अलावा दूसरे विषयों पर बातचीत की महफिल भी उनके साथ खूब सजती थी. कई बार हम रात देर तक बैठकर बातें करते रहते थे. मगर उन अनौपचारिक बैठकों में भी काम के मुद्दों की एक सूची उनके पास तैयार रहती थी.
गंभीर विषयों पर बात पूरी हो जाने के बाद दादा का व्यक्तित्व जैसे खुलकर सामने आ जाता था. तब उनके भीतर का असली ‘दादा’ नजर आता था, बेफिक्र, बिंदास और किसी की परवाह न करने वाला. उनके व्यक्तित्व का भावनात्मक पक्ष बहुत कम लोगों ने देखा महसूस किया होगा, लेकिन मुझे वह रूप भी करीब से देखने का मौका मिला. क्योंकि हमने बहुत कम समय में ही साथ मिलकर बड़े-बड़े काम कर डाले थे.
हम दोनों के स्वभाव में कई समानताएं थीं. काम लेकर आने वाला किस पार्टी से है, इसका विचार दादा ने कभी नहीं किया. वे हमेशा लोगों के बीच ही रहे. आज भी वे सभाओं के लिए सुबह-सुबह ही ही निकल पड़े थे.
आज मन में अनगिनत पीड़ाएं हैं. मंगलवार को मंत्रिमंडल की बैठक में हम दोनों साथ थे. उसके तुरंत बाद मंत्रिमंडल की बुनियादी सुविधा समिति की बैठक मेरे कक्ष में हुई, वहां भी दादा मेरे साथ थे. महाराष्ट्र में बुनियादी सुविधाओं पर अन्य राज्यों की तुलना में सबसे अधिक खर्च होता है, इस पर दादा ने सवाल उठाया. परियोजनाएं अटक रही हैं, इस पर हमने दोनों ने ही नाराजगी जताई.
बैठक में यह जानकारी दी गई कि सार्वजनिक निर्माण विभाग ने सरकार के 764 करोड़ रुपए बचाए हैं. यह सुनकर दादा खुश भी हुए. हमेशा खजाने की चिंता करने वाले वित्त मंत्री के रूप में उनके रहते मैं निश्चिंत रहता था. उन्होंने हंसते हुए यह भी कहा कि ऐसी अच्छी खबरें हर बैठक में देते रहिए. लेकिन ऐसी खबरें सुनने के लिए वे अगले ही दिन से हमारे बीच नहीं होंगे- यह उन्होंने नहीं बताया.
बैठक खत्म होने के बाद भी हम लगभग पौन घंटे तक मेरे कक्ष में बैठकर बातें करते रहे. नियति बड़ी निर्दयी होती है, उसके आगे हम लाचार होते हैं.
दादा! आप तो समय के बड़े पाबंद थे न. लेकिन इस बार आप ही वक्त से पहले चले गए. दादा, यह कसक हमेशा बनी रहेगी कि आपने बहुत जल्दी ‘एक्जिट’ ले ली.




